भृंगी कथा से प्रकट हुआ माता सिद्धिदात्री और अर्धनारीश्वर महिमा

Navratre

शुंभ और निशुंभ, दोनों राक्षसों का वध हो चुका था। कालिका, अपने महागौरी रूप में पुनः स्थापित हुईं। संसार अब पूर्ण रूप से सुरक्षित था। उधर शिव के अनन्य भक्तों में से एक भृंगी ऋषि थे। भृंगी ने घोर तप से महादेव को प्रसन्न कर, वर मांगा कि वे जब भी चाहें, भोलेनाथ उन्हें दर्शन देंगे। शिव जानते थे, कि ऐसे तो हर क्षण उन्हें प्रगट ही रहना पड़ेगा। इसलिए शिव ने उन्हें कैलाश में जब चाहे आने-जाने की अनुमति दे दी लेकिन भृंगी, यह आने-जाने का झंझट छोड़ कर कैलाश में ही रहने लग गए। अब तो हर समय बाबा सामने, और भृंगी उनकी अर्चना में। यह अनन्य भक्ति ऐसी थी, कि वे अकेले शिव पूजा ही करते, माता की नहीं। उधर माता तो प्रसन्न ही थीं, कि उनके स्वामी का कोई ऐसा अनूठा भक्त भी है। पर कैलाश के गणों ने भृंगी को बहुत समझाया, कि युगल सरकार की भक्ति, जोड़े में ही की जाती है। अकेले शिव पूजन अधूरा माना जाता है। लेकिन भृंगी की भक्ति, धीरे-धीरे, अहंकार में बदली, और फिर मूर्खता बनने लगी थी। इसी मूर्खता में एक दिन भृंगी ने शिव पूजन किया, और परिक्रमा को चले। अभी आधी परिक्रमा ही हुई थी। शिव पार्वती साथ ही विराजमान थे। भृंगी ने माता से तनिक अलग हट जाने को कहा, जिससे वे शिव परिक्रमा कर सकें। उमा विनोद के भाव में थीं। यह मेरे पति हैं, मैं किसी भी स्थिति में उनसे अलग नहीं हो सकती, कहकर उमा ने मना कर दिया। अब भृंगी ने सर्प का रूप लिया। यह सर्प शिव पार्वती के बीच में से निकल कर, परिक्रमा पूरी करने का प्रयास करने लगा। उसकी अज्ञानता पर शिव-शक्ति हँस पड़े। भक्त को अब पूर्ण सत्य के दर्शन कराने ही होंगे। और अब एक क्षण भी न बीता था, कि महादेव और गौरा एक ही शरीर में एकाकार हो गए। दाहिने भाग में भस्म अंग, बाघाम्बर और सर्प भूषित, गंगाधर, जटाजूट धारी महाकाल थे। और बायां अंग चंद्रोज्ज्वला, स्वर्णकांता, रक्तांबर भूषिता, जगदंबा प्रगट थीं। इस अर्धनारीश्वर रूप पर संसार मोहित हो उठा। तीनों लोक पुष्प-आरती सहित इस स्वरूप की आराधना करने लगे। उधर वह बौड़म भृंगी अपने में ही मगन थे। अर्धनारीश्वर रूप प्रगट हुआ, तो भृंगी ने चूहे का रूप ले लिया, ताकि बीच में से कुतर कर शिव को पार्वती से अलग कर सकें। इस दुस्साहस ने सारी मर्यादाएं तोड़ दी थीं। अब माता भयंकर क्रोध में बोलीं- रे दुष्ट, तूने भोलेनाथ से मुझे अलग समझा? जिस अहंकार में तुझे यह अर्धनारीश्वर का एकाकार स्वरूप नहीं दिखा, वही तेरे विनाश का कारण बनेगा। किसी भी शरीर में उसकी हड्डियां और शिराएं उसे अपने पिता से, और रक्त-मांस अपनी माता से प्राप्त होते हैं। यदि तू मातृशक्ति को इतना हीन समझता है, तो जा, इसी क्षण यह मातृ तत्व तुझसे अलग हो जाए। इतना कहते ही, एक क्षण में भृंगी रक्त और मज्जा से विहीन, केवल कंकाल तंत्र होकर गिर पड़े। महाकाल के आस पास काल नहीं आते, इसलिए भृंगी की मृत्यु नहीं हो सकती। वह पीड़ा में तड़पने लगे। आखिर शिव को करुणा हो आई। उन्होंने गौरा से भक्त की दशा सुधारने की विनती की। लेकिन भृंगी ने आगे बढ़कर कहा, हे माता, मुझे देख संसार शिक्षा ले सके, इसलिए मुझे इसी अवस्था में रहने दें। पर गौरा कृपालु हैं। उन्होंने भृंगी की बात भले ही मान ली, पर वे इस कंकाल रूप में ठीक तरह से चल सकें, अतः एक पग और दिया। और वह तीन पगों वाले भृंगी, शिवगण बन कर कैलाश में रहने लगे। उसकी अनोखी भक्ति की स्मृति में आज तक, भोलेनाथ की आधी परिक्रमा ही की जाती है। भृंगी पर गौरा की इस उदारता पर शिव प्रसन्न थे। उन्होंने उमा से कहा हे शुभे, आपकी सहृदयता अद्वितीय है। आपने अपंग को भी चल सकने की शक्ति प्रदान की है। आज से आप विश्व में सिद्धिदात्री रूप में पूजित होंगी। विश्व समस्त सिद्धियों के लिए आपकी आराधना करेगा। देवता प्रसन्नता से जयकारे लगाते थे। आज सृष्टि में गौरीशंकर का यह अर्धनारीश्वर रूप स्थापित हुआ था। साथ ही माता सिद्धिदात्री भी आलोकित हुईं थीं। माता सिद्धिदात्री समस्त वरदायिनी हैं। मुख्य अष्ट सिद्धियां, और अन्य लघु सिद्धियां, माता की दासियां हैं। जिनमें— अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व हैं। अन्य लघु सिद्धियां— वाकसिद्धि, दृष्टि, श्रवण, जल गमन, वायुगमन, अन्तर्ध्यान, विशोक, सम्मोहन, कायाकल्प, देव क्रिया, सुदर्शन, अनुर्मी आदि हैं, जो मां की इच्छा से ही फलित होती हैं। ब्रह्माजी को दिए वरदान अनुसार, स्त्री जीवन के नौ चरणों के विकासक्रम में माता का नौवां रूप आज प्रगट हुआ था। आदिशक्ति के वे सभी अंश, आज तक अपनी एक विशेषता से जाने जाते थे। शैलपुत्री एक बिटिया थीं, ब्रह्मचारिणी एक तपस्विनी। चंद्रघंटा में नवविवाहिता का रूप मुखर है, और कुष्मांडा में रचनाकारिता लक्षित है। स्कंदमाता साक्षात वात्सल्य मूर्ति है, और कात्यायनी में तेज निहित है। कालरात्रि, अंधकार को दूर कर प्रत्यक्ष ऊर्जा है। इन रूपों के क्रम में बढ़ती ऊर्जा, और शक्ति ने महागौरी में विश्राम पाया। महागौरी पूर्णता और ठहराव का स्थान है। सिद्धिदात्री जैसे इन सारे स्वरूपों का एकाकार भी हैं, और विस्तार भी। सब सिद्धिदात्री में ही निहित भी है और सब उनमें ही जागृत भी। आज माता के नौ स्वरूपों के दर्शन पूर्णता के साथ ही यह शृंखला यहीं शेष करती हूं। माता के चरणों में अर्पित ये शब्दपुष्प वे करुणामई स्वीकार करेंगी ऐसी आशा है। सर्वेश्वरी जगदंबा स्तुति के विशाल आकाश में यह प्रयास कण मात्र भी नहीं। पर माता की करुणा पर हम सब की आस्था और दृढ़ हो। इतने दिनों आप सब से इस नवरात्र शृंखला के माध्यम से जुड़ी रही। आपके हजारों आशीर्वाद संदेश मिले। उन सब के लिए आभार व्यक्त करने में शब्द कम पड़ते हैं। आपकी इस सहृदयता के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद। नवरात्र हम सब के लिए मंगलमय हो…।। महामाया जगदंबा की जय ।

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