सीमा सन्देश के संपादक ललित शर्मा ने अपने संबोधन में कहा कि हम शोक सभाओं में आकर हुतात्माओं के बारे में बहुत कुछ अच्छा सुनते-बोलते हैं। उनके जीवन आदर्शों की सराहना भी करते हैं, लेकिन विडम्बना यह है कि उनका अपने जीवन में अनुसरण नहीं करते। आपने एडवोकेट काशीराम जी की कर्मठता, कार्य के प्रति निष्ठा, मिलनसारिता तथा सादगीपूर्ण जीवन जीने के आदर्शों को रेखांकित करते हुए कहा कि उनके पुत्र इंजीनियर मदन मोहन और डॉ. सुरेश ने अपने पिता के जीवन को जीने का प्रयास किया है। श्री शर्मा ने कहा कि इस संसार में मां हमें जीवन देती है और पिता हमारा जीवन बनाता और संवारता है, तो इस काम में हमारी मां का भी पूर्ण सहयोग रहता है। हमारी उम्र चाहे कितनी भी हो जाए, जब तक माता-पिता जीवित होते हैं तब तक हम बच्चे ही रहते हैं।
इस मौके पर श्री शर्मा ने निदा फाजली की पंक्तियां ‘तुम्हारी कब्र पर मैं फातिहा पढ़ने नहीं आया, मुझे मालूम था तुम मर नहीं सकते …’ पढ़ते हुए बताया कि एक पिता कभी मर नहीं सकता, वह अपनी संतान में विचारों, भावों, आदतों, तरक्की व जीवन के उतार-चढ़ाव के रूप में ताउम्र सदैव जीवित रहता है।
उन्होंने कहा कि एडवोकेट काशीराम जी से 5-6 बार मिलना हुआ। मैंने उन्हें सदैव अपने काम में व्यस्त ही पाया। उन्हें कभी धनी व्यक्ति के रूप में नहीं देखा। उन्होंने कभी किसी को छोटा नहीं समझा और सभी से सहृदयता से मिलते थे। ऐसे शानदार व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति को शब्दों से श्रद्धांजलि देने के बजाय हमें उनकी बातों व जीवन को अपने आचरण में समाहित करना चाहिए।
सभा में एडवोकेट सुरेन्द्र सिंह भनोत ने उन्हें कार्य के प्रति समर्पित और तनावमुक्त व्यक्तित्व बताया। वरिष्ठ महिला चिकित्सक डॉ. पी.एल. ओहरी ने उनके सादगीपूर्ण और उदारमना जीवन को आदर्श बताया। इनके अलावा एडवोकेट नवरंग चौधरी, रामकुमार सहारण और सुषमा पूनिया ने भी अपने विचार रखे।
ये रहे मौजूद: सभा में श्रीराम शर्मा, डॉ. बृजमोहन सहारण, डॉ. श्रीधर शर्मा, दरबारा सिंह, एड. चरणदास कम्बोज, बार संघ अध्यक्ष हंसराज तनेजा, अमित छाबड़ा, बार संघ के पूर्व अध्यक्ष, लक्ष्मीनारायण सहारण, विजय रेवाड़, जसवीर सिंह मिशन, सुरेश अरोड़ा, राजन कुक्कड़, विक्रम पूनिया, विजय बिश्नोई, विशाल गौड़, कमला बिश्नोई सहित बड़ी संख्या में शहर के गण्यमान्यजन व रणवा परिवार के रिश्तेदार व शुभचिंतक मौजूद रहे।
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