रक्तबीज के अंत के बाद माता को महादेव ने शांत करने का प्रयास किया। उन्हें प्रेम पूर्वक कैलाश ले आए।कालरात्रि रणभूमि से तो लौट आईं, लेकिन उनका रूप अभी सामान्य नहीं हुआ था। भयंकर क्रोध के कारण उनका सुंदर स्वर्ण जैसा गोरा रंग, काला पड़ गया था। पर थीं तो वे अप्रतिम सौन्दर्य की स्वामिनी। अभी केश बांध लिए थे, तीसरा नेत्र बंद था। सौभाग्य चिह्न धारण किए थे। और इस कालिमा में भी माता दिव्य ही थीं।
उन की ओर उठती हर दृष्टि, आलोक से भर जाती, और श्रद्धा भरे मन, उनके वात्सल्य के याचक
होते। देवी कैलाश तो आ गईं, लेकिन शुंभ और निशुंभ का जीवित रह जाना, हर क्षण उन्हें स्मरण था।
वे जानती थीं, कि विष को जड़ से ही समाप्त करना होगा। नहीं तो वह आगे चल कर फिर अपनी क्रूरता
दिखाएगा। दुष्टों से अपना मूल स्वभाव छोड़ा नहीं जाता। संभवत: इसी अधूरे कार्य की कालिमा अभी
तक गौरा पर आच्छादित थी. लेकिन अभी तो संसार में शांति थी। इधर शिव-पार्वती का समय पहले की तरह, संसार कल्याण में चलने लगा। एक दिन महादेव ने परिहास में पार्वती को पुकारा-‘हे काली, तनिक सुनें, कुछ बातें कहनी हैं’। पर माता उस समय पता नहीं किस सोच में थीं, उन्हें केवल काली’ शब्द सुनाई दिया। आगे
महादेव के शब्द तो उन्हें याद भी नहीं। बस, लीला आरम्भ… वे मानिनि रूठ गईं। शिव देर तक मनाते रहे। पर पत्नी का अबोला, इतनी सहजता से तो न टूटता। शिव उपाय करते रहे। पर पार्वती को वह ‘काली’ शब्द चुभ गया था। वे स्वयंसिद्धा हैं। उन्हें या उनकी सृष्टि में त्वचा के रंग का कोई मोल नहीं। लेकिन यहां काला रंग, क्रोध से जन्मा था। यह दो दैत्यों के जीवित रह जाने की नकारात्मकता थी। कोई स्त्री लंबे समय तक इस नकारात्मक
भाव में नहीं रहना चाहती। उसे तो सकारात्मकता, प्रेम, सहजता और सरलता में ही आनन्द है।
पार्वती ने इसका उपाय निकाला। वे ब्रह्मजी की तपस्या में लीन हुईं, कि वे सृष्टि के रचयिता, संभवत: उमा का पुराना कलेवर जागृत करें। ब्रह्माजी कुछ ही समय में प्रगट हो गए। माता को प्रणाम किया, और बोले-‘हे आदिशक्ति, आप संभवत: मुझसे विनोद करती हैं। जगत में आपके लिए क्या दुर्लभ
है सर्वेश्वरी। फिर भी आपकी सेवा में निवेदन करता हूं। आप मानसरोवर में स्नान करें। आपका मन शांत हो जाएगा। उसके बाद, महादेव आपका गंगाजल अभिषेक करें। इस सारी क्रिया में संसार का एक और कल्याण निहित है।’ यह मत महादेव के मन को भी भा गया। पत्नी का रूठना अब उन्हें सहन नहीं। उमा ने मानसरोवर में प्रवेश किया। तीन डुबकियां लगाईं। अब महादेव ने जटाएं खोलीं। गंगा जी की धार पार्वती पर बह चली। उस
धार के साथ, पार्वती की सारी कालिमा ऐसे उतरती चली गई, जैसे काले रंग का बस उबटन लगा रखा था। पार्वती के शरीर से निकली इस कालिमा ने एकत्रित होकर, एक स्त्री-आकार धारण कर लिया। बिल्कुल कालिका की प्रतिकृति। दैत्य वध के लिए आवश्यक पार्वती के क्रोध, तेज, युद्ध कौशल, और हर सम्बन्ध, और उससे जुड़े दायित्व निभाती स्त्री धीरे-धीरे पूर्णता की ओर बढ़ती है। और पूर्णता प्राप्त होने के क्रम में, वे गौरी से महागौरी हो जाया करतीं हैं। थे। वे कई दिनों से कालिका पर दृष्टि रखे हुए थे। उन्होंने आज कौशिकी को सरोवर से निकलते देखा, तब पहले तो दोनों मूर्ख, उन पर मोहित हो उठे। फिर उन्हें ध्यान आया, इसी काली स्त्री ने, चण्ड-मुण्ड, और रक्तबीज सहित उनकी सारी सेना नष्ट की थी। अहंकार में आकर उन्होंने युद्ध के लिए कौशिकी को ललकारा। कौशिकी अत्यंत प्रसन्न हुईं। भयंकर युद्ध चला। अंतत: कौशिकी ने शिव-त्रिशूल, शुंभ की
छाती के पार उतार दिया। निशुंभ भयभीत होकर भागा, और कौशिकी ने उसके दो टुकड़े कर दिए। पार्वती के शरीर से अलग होने का उद्देश्य पूरा हो चुका था। वे कौशिकी, सृष्टि पूजित होकर आदिशक्ति के मूल स्वरूप, अर्थात्उ स दिव्य ज्योतिपुंज में समा गईं। रणनीतियों से भरपूर थी यह प्रतिकृति। यह रूप, उमा के युद्ध
ज्ञान-कोश से प्रगट हुआ था। उनके इस अद्भुत, और सर्वज्ञानी रूप को भोलेनाथ ने एक नया नाम दिया था
कौशिकी’ (जो ज्ञान-कोश से उत्पन्न हुईं हों)। यह नाम सर्वथा उमा के लिए ही उपयुक्त था। और
कल्याणी प्रसन्न हुईं। उधर दैत्य राज शुंभ, और निशुंभ कालरात्रि से युद्ध की ताक में इधर कौशिकी के निकलने के बाद पार्वती का शरीर एकदम हल्का हो गया। पार्वती के मन से नकारात्मकता की कालिमा और
भार उतर गए। वे अत्यंत गौर वर्ण की हो गईं। एकदम श्वेत वस्त्रों और आभूषणों से सज्जित, वे श्वेतांबरधरा देवी हैं। शांति, शुचिता, और सौम्यता की अधिष्ठात्री महागौरी प्रगट हुईं। आज से वृषारूढ़ा महागौरी, अपने आठवें
स्वरूप में स्थापित हुईं। उनकी साधना से हर जीवन में सरलता, सहजता और सुंदर प्रकाश होगा। आज तक पार्वती, पिता, पुत्र, या पति के साथ संबंधों की भावनाओं में परिलक्षित थीं। अपने जीवन के ब्रह्माजी को दिये वचन में आज आठवां रूप स्पष्ट हुआ था। स्त्री जीवन में मनोभावों, और जीवन के अलग-अलग चरण होते हैं। स्त्रियां विकासक्रम के इन चरणों को पार करते हुए अपनी एक पहचान सुनिश्चित करती है। और तब उनमें एक विशेष ठहराव, गरिमा, और ओज झलकता है। यही महागौरी हर स्त्री में जगमगाती हैं। संसार में अपने आस-पास की हर स्त्री, जिन्होंने जीवन दायित्व निभाए हैं, उनमें जागृत महागौरी को, आदिशक्ति के अंश को बारंबार नमन है। माता की यह कोमलता हम सब के मन में स्थाई हो। यह नवरात्र हम सब पर फलित हों, इन्हीं मंगलकामनाओं में
यही महागौरी संसार की हर स्त्री में जगमगाती हैं !

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