किसी समय श्रीगंगानगर की शान और शहरवासियों के सुकून का केंद्र रहा ‘इंदिरा वाटिका पार्क’ आज विकास की एक ऐसी विद्रूप परिभाषा लिख रहा है, जिसे देख हर नागरिक आहत है। कभी मखमली घास और रंग-बिरंगे फूलों से महकने वाले इस पार्क में अब हरियाली की जगह सूखी धरती ने ले ली है। स्थिति यह है कि प्रकृति भी शायद प्रशासन की फाइलों में दबे पुनरुद्धार की योजना का इंतजार करते-करते थक चुकी है। पार्क के प्रवेश द्वार पर बिखरे सूखे पत्तों और गंदगी के ढेर आगंतुकों का ऐसा ‘भव्य’ स्वागत करते हैं कि अंदर जाने से पहले ही सरकारी दावों और ‘स्वच्छता अभियान’ की जमीनी हकीकत साफ नजर आ जाती है। टूटे झूले दे रहे हादसों को दस्तक। पार्क में बच्चों के मनोरंजन के लिए लगाए गए झूले अब उनके लिए खतरनाक साबित हो सकते हैं। अधिकांश झूले या तो पूरी तरह टूट चुके हैं या क्षतिग्रस्त अवस्था में हैं। बच्चों के लिए बनी स्थायी ‘फिसलन पट्टी’ ऊपर और नीचे दोनों साइडों से टूटकर क्षतिग्रस्त हो चुकी है, जिससे मासूम बच्चे चोटिल हो सकते हैं। लोहे के छोटे ‘अप एंड डाउन’ व गोल घूमने वाले झूले भी खराब हो रहे हैं। महिलाओं और बालिकाओं के लिए लगे दो झूलों के अलावा अन्य झूलों की हालत भी दयनीय है; पाइपों के सहारे केवल लोहे की सांकलें ही झूल रही हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रशासन ने मान लिया है कि बच्चों को खुले पार्क की नहीं, बल्कि मोबाइल और घर की चारदीवारी की ही जरूरत है।
‘शहर की शान’ इंदिरा वाटिका पार्क बनता जा रहा उपेक्षा का शिकार

Leave a Reply