हर हिन्दु को मंदिर में प्रवेश का अधिकार : जस्टिस

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में केरल के सबरीमला मंदिर में प्रवेश से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि हिंदू समाज को एकजुट रहना चाहिए और मंदिरों में संप्रदाय के आधार पर किसी को बाहर नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि “एक हिंदू, अंततः हिंदू ही होता है और वह किसी भी मंदिर में जा सकता है।”

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ में इस मामले की सुनवाई जारी है। पीठ धार्मिक स्वतंत्रता, संप्रदायिक अधिकार और समानता से जुड़े जटिल सवालों पर विचार कर रही है। साथ ही अनुच्छेद 25, 26 और 14 के बीच संतुलन तथा ‘संवैधानिक नैतिकता’ की भूमिका की भी जांच की जा रही है।संप्रदाय बनाम व्यक्तिगत अधिकार—सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि पूजा की विभिन्न पद्धतियां जैसे शैव या वैष्णव संरक्षित हो सकती हैं, लेकिन इसके आधार पर किसी हिंदू को दूसरे मंदिर में जाने से रोका नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि संप्रदायों के बीच दीवार खड़ी करना अंततः समाज को कमजोर करेगा।

ज्ञान के स्रोतों पर टिप्पणी—बहस के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता द्वारा एक लेख का हवाला दिए जाने पर अदालत ने कहा कि विश्वसनीय स्रोतों का स्वागत है, लेकिन अप्रमाणित जानकारी से बचना चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत राय को कानूनी आधार नहीं माना जा सकता।

सामाजिक सुधार में राज्य की भूमिका—पीठ ने यह भी कहा कि राज्य कोई बाहरी संस्था नहीं, बल्कि जनता की इच्छा का प्रतिनिधि है। यदि समाज सुधार चाहता है, तो राज्य को हस्तक्षेप करने का अधिकार है। अनुच्छेद 25(2) के तहत बनाए गए कानून धार्मिक प्रथाओं को प्रभावित कर सकते हैं।

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