अंकों का भ्रमजाल और शिक्षा की वास्तविक चुनौती

हाल ही में माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, राजस्थान द्वारा घोषित दसवीं और बारहवीं के परीक्षा परिणामों ने कई महत्वपूर्ण पहलुओं को उजागर किया है। बारहवीं कला वर्ग में लगभग 5.33 लाख विद्यार्थी उत्तीर्ण हुए, जिनमें 65 प्रतिशत से अधिक प्रथम श्रेणी में रहे। खास बात यह रही कि छात्राओं ने एक बार फिर बेहतर प्रदर्शन करते हुए शीर्ष स्थान हासिल किया।

बदलती प्रवृत्ति: छात्राएं आगे
पिछले कुछ वर्षों से बोर्ड और प्रतियोगी परीक्षाओं में छात्राओं का प्रदर्शन लगातार बेहतर हो रहा है। उच्च शिक्षा में भी उनका नामांकन बढ़ रहा है, जबकि छात्रों की संख्या में गिरावट देखी जा रही है। यह सामाजिक बदलाव सकारात्मक है, लेकिन इसके पीछे छिपी चुनौतियों को समझना भी जरूरी है।

अंकों की बढ़ती दौड़
आज सरकारी विद्यालयों में भी 80–90 प्रतिशत अंक सामान्य हो गए हैं। जहां कभी 60 प्रतिशत अंक बड़ी उपलब्धि माने जाते थे, अब प्रथम श्रेणी भी खास नहीं रही। एलकेजी-यूकेजी स्तर पर भी 90 प्रतिशत से कम अंक आने पर चिंता जताई जाती है। इससे बच्चों पर मानसिक दबाव बढ़ रहा है और अंक ही सफलता का एकमात्र मापदंड बनते जा रहे हैं।

परीक्षा प्रणाली पर सवाल
परीक्षा के प्रश्नपत्रों का स्तर कम कर अधिक छात्रों को पास किया जा रहा है, जबकि प्रतियोगी परीक्षाओं में कठिनाई स्तर इतना अधिक होता है कि कई पद खाली रह जाते हैं। यह विरोधाभास शिक्षा व्यवस्था की गंभीर खामी को दर्शाता है।

शिक्षा बनाम रोजगार
तकनीकी विकास और वैश्वीकरण के दौर में शिक्षा का दायरा तो बढ़ा है, लेकिन रोजगार के अवसर सीमित होते गए हैं। आज लाखों युवा उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी रोजगार के लिए संघर्ष कर रहे हैं। पहले जहां कम शिक्षित लोगों को भी रोजगार मिल जाता था, वहीं अब उच्च डिग्रियां भी पर्याप्त नहीं हैं।

विद्यालयों की हकीकत और नामांकन का विरोधाभास
एक ओर परिणाम बेहतर हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सरकारी स्कूलों में लगभग 25 प्रतिशत पद रिक्त हैं। शिक्षकों को गैर-शैक्षिक कार्यों में लगाया जाता है, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत आरक्षण से वहां नामांकन बढ़ रहा है, जबकि सरकारी विद्यालयों में गिरावट जारी है। अभिभावक बेहतर शिक्षा और सुविधाओं की तलाश में निजी संस्थानों की ओर रुख कर रहे हैं।

समाधान की दिशा
आवश्यक है कि शिक्षा को केवल अंकों तक सीमित न रखकर कौशल और व्यावहारिक ज्ञान से जोड़ा जाए। सरकारी विद्यालयों में रिक्त पद भरे जाएं, शिक्षकों को गैर-शैक्षिक कार्यों से मुक्त किया जाए और पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराए जाएं। साथ ही शिक्षा के साथ रोजगार के अवसरों को भी जोड़ा जाए, ताकि विद्यार्थी केवल डिग्रीधारी नहीं बल्कि सक्षम और आत्मनिर्भर नागरिक बन सकें। तभी अंकों के इस ‘फील गुड’ भ्रम से बाहर निकलकर वास्तविक विकास की दिशा में कदम बढ़ाया जा सकेगा।

सरदूल सिंह, शिक्षक, श्रीकरणपुर

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