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शिक्षा सचिव ने देश में बढ़ती कोचिंग संस्कृति पर उठाये सवाल

नयी दिल्ली (वार्ता). स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग के सचिव संजय कुमार ने देश में बढ़ रही कोचिंग संस्थान संस्कृति पर सवाल उठाते हुए कहा कि इस बारे में देश में एक गंभीर चर्चा होना अपरिहार्य है।
श्री कुमार ने रीबूट- रीइमेजिन -रिबिल्ड विषय पर पांचवी एफआईसीसीआई अराइज स्कूल कांफ्रेंस को संबोधित करते हुए कहा, क्या कोचिंग ऐसी कोई जगह है जहां जाकर या पढकर शिक्षा को कोई बढ़ावा मिलेगा, यह ऐसे सवाल है जिसपर बात करने की दरकार है। जिस तरह से चीजें देश में उभर रहीं हैं उसे देखकर लगता है कि हमारे स्कूलों में आने वाले छात्रों की संख्या और कई स्तरों में गिरावट आ रही है। उन्होंने कहा कि बच्चे स्कूल छोड रहे हैं और इस कारण वह शिक्षा तंत्र से सीख पढकर उभरने जैसी चीजों को खोते जा रहे हैं और शायद स्कूली व्यवस्था में पढ़ने और बढ़ने के एक अलग एहसास से भी वह वंचित हो रहे हैं।
उन्होंने कहा, मुझे लगता है कि इस मामले पर बात होनी चाहिए। हम कहां जा रहे हैं हमें इस पर विचार करने की जरूरत है कि किस तरह का प्रभाव यह कोचिंग और दूसरी चीजें अपने तंत्र पर डाल रहे हैं। यहां तक की 10वीं और 12वीं को करने के लिए भी फिर इन कोचिंगों की ओर ही देखता होता है।
उन्होंने कहा कि हाल में देश में शिक्षा पर जीडीपी का 4़ 6 प्रतिशत खर्च किया जाता है उसे बढाकर कम से कम छह प्रतिशत किया जाना चाहिए। जब अर्थव्यवस्था बढ़ रही है तो हमें शिक्षा पर भी और खर्च करने की जरूरत है। देश के शिक्षा तंत्र में प्रशिक्षण और आधारभूत जरूरतों को शामिल किये जाने की दरकार है।
शिक्षा सचिव ने शिक्षा नीति में भी बदलाव करने में की जरूरत को रेखांकित करते हुए बच्चों के लिए एक ऐसा वातावरण शिक्षा नीति के माध्यम से तैयार करने की जरूरत को रेखांकित किया जिसे बच्चे सूचना के आधार पर सीख सकें। तकनीक के इस युग में उदार कला को भी अपना धरातल दोबारा खोजने की जरूरत है।
श्री कुमार ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य हर व्यक्ति में एक ऐसे आंतरिक ज्ञान को विकसित करना है कि जिसकी मदद से वह दुनिया में अपना रास्ता स्वयं खोज पाये।