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बुजुर्ग मानेंगे नहीं और युवाओं से संवाद मुश्किल, कैसे कांग्रेस के ‘आलाकमान’ बन पाएंगे मल्लिकार्जुन खड़गे

नई दिल्ली
मल्लिकार्जुन खड़गे ने चुनाव में जीत हासिल कर कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी संभाल ली है। 80 साल के मल्लिकार्जुन खड़गे दलित बिरादारी से आते हैं और गांधी परिवार के वफादार हैं। कांग्रेस ने उनमें वोटबैंक और हाईकमान से करीबी जैसी दो खूबियां देखते हुए अध्यक्ष पद सौंपा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या कांग्रेस के लिए यह भी एक व्यवस्था ही है या फिर बदलाव की कोई शुरुआत मल्लिकार्जुन खड़गे कर पाएंगे? इसका जवाब दे पाना कांग्रेस के लिए आसान नहीं है। इसकी वजह यह है कि मल्लिकार्जुन खड़गे खुद कोई बड़ा जनाधार नहीं रखते हैं और केंद्र की राजनीति में भी उनका ऐसा कद नहीं रहा है कि तमाम वरिष्ठ नेता आसानी से उनको फॉलो करें।
इसके अलावा युवा नेताओं से संवाद स्थापित कर पाना भी उनके लिए आसान नहीं होगा। मल्लिकार्जुन खड़गे को अध्यक्ष बनाए जाने से उदयपुर में पारित प्रस्तावों पर भी सवाल खड़े किए हुए हैं। तब कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में कहा गया था कि युवाओं को मौका दिया जाएगा, लेकिन खड़गे को अध्यक्ष बनाने से इस पर प्रश्न चिह्न लगा है। यही नहीं वर्किंग कमेटी की औसत आयु भी 68 साल है, जिसमें 50 साल से कम की उम्र का कोई भी नेता शामिल नहीं है। इसलिए कांग्रेस की रणनीति पर भी पलीता लगता दिख रहा है। बिना युवाओं को जोड़े कांग्रेस खड़गे के भरोसे अपनी उम्मीदों को परवान चढ़ा पाएगी।

गहलोत और कमलनाथ जैसों से कैसे डील करेंगे खड़गे

इससे भी बड़ी मुश्किल मल्लिकार्जुन खड़गे के आगे यह होगी कि वह राज्यों के क्षत्रपों को कैसे संभालें? जो अशोक गहलोत सोनिया गांधी तक को आंख दिखा चुके हैं, उनसे मल्लिकार्जुन खड़गे कैसे डील करेंगे? या फिर मध्य प्रदेश में कमलनाथ और दिग्विजय सिंह उनकी कितनी सुनेंगे, यह भी एक सवाल है। ऐसी तमाम चीजों से 80 साल के खड़गे कैसे निपटते हैं, यह देखने वाली बात होगी।