Saturday, December 3निर्मीक - निष्पक्ष - विश्वसनीय
Shadow

बांसुरी के दीवाने हैं युवा:बांसुरी वादक प्रवीण गोडखिंडी ने चिड़ियों के चहचहाने, कोयल की कूक को बांसुरी से किया जीवंत

श्रीगंगानगर
बांसुरी वादक प्रवीण गोडखिंडी ने कहा है कि बांसुरी सांस के स्टेमिना से बजने वाला इंस्ट्रूमेंट है। इसे वर्तमान दौर में युवा भी पसंद कर रहे हैं। वे शुक्रवार को शहर के हनुमानगढ़ रोड स्थित ब्लूमिंग डेल्स इंटरनेशनल स्कूल में स्पिक मैके की ओर से हुए आयोजन में प्रस्तुति देने आए थे। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय संगीत के लिए अच्छा है। युवा भी शास्त्रीय संगीत के प्रति रुचि दिखा रहे हैं।

कान फोडू़ संगीत हमेशा रहा चुनौती

उन्होंने कहा कि शास्त्रीय संगीत के लिए हमेशा से ही कान फोड़ू संगीत चुनौती रहा है। इस तरह का संगीत युवाओं को अपनी ओर खींचता है। ऐसे में श्रीगंगानगर ही नहीं हर तरफ एक ही ट्रेंड है। कुछ युवा इस तेज आवाज वाले संगीत को पंसद कर रहे हैं लेकिन अब भी युवा वर्ग में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो संगीत की पुरानी विधा को पसंद करते हैं। उन्होंने कहा कि बांसुरी सकून देने वाला इंस्ट्रूमेंट है। यह सांस के स्टेमिना पर बेस्ड है। बांसुरी में सांस को छोड़ने से यह ध्वनि देता है। उन्होंने भगवान कृष्ण को बांसुरी का पितामह बताया।

राग वृंदावनी सारंग से की शुरुआत

इससे पहले स्कूल के ऑडिटोरियम में दी प्रस्तुति में गोडखिंडी ने राग वृंदावनी सारंग से शुरुआत की। उन्होंने रूपक और तीन ताल के साथ दी प्रस्तुति में सब को बांधे रखा। उन्होंने इस दौरान सांस और बांसुरी के सामंजस्य से कई बार ऐसी तान छेड़ी कि हॉल तालियों से गूंज उठा। इसके बाद राग मिश्र पहाड़ी में प्रस्तुति दी। बांसुरी के माध्यम से सुबह के समय चिड़ियों के चहचहाने, कोयल की कूक सहित प्राकृतिक जीवन को संगीत के माध्यम से मंच पर उतारा। तबले पर संगत जौहेब खान ने की।

इससे पहले कार्यक्रम की शुरुआत विशिष्ट अतिथि बीएसएफ के डीआईजी अमित कुमार त्यागी ने दीप प्रज्विलित कर की। कार्यक्रम में भारती चैरिटेबल ट्रस्ट के अध्यक्ष सोहनलाल सिहाग, सचिव अजय गुप्ता, कोषाध्यक्ष श्याम जैन, ट्रस्टी सुरेंद्र ढाका और प्राचार्य मीतू शर्मा ने अतिथियों को स्मृति चिन्ह भेंट किए।

कई देशों में प्रस्तुति दे चुके हैं प्रवीण
प्रवीण गोडखिंडी मूल रूप से कर्नाटक के रहने वाले हैं और तीन साल की उम्र से ही संगीत का अभ्यास शुरू किया। उन्होंने पंडित वेंकटेश गौड़खिंडी और अनूर अनंतकृष्ण शर्मा से बांसुरी के गुर सीखे। अब तक कई देशों में प्रस्तुति दे चुके हैं।