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पंजाब पर जीडीपी का 45 फीसद से अधिक कर्ज

  • मुफ्त चुनावी घोषणाओं की सजा भुगत रहा राज्य, ऐसे शुरू हुआ सिलसिला
    चंडीगढ़।
    पंजाब पर सियासी दलोंं द्वारा की गईंं मुफ्त चुनावी घोषणाएं बहुत भारी पड़ रही है। इसके कारण राज्य के खजाने की बुरी हालत हो गई है और कर्ज लगातार बढ़ रहा है। हालत यह हो गई है कि राज्य की सकल घरेलू उत्पाद के 45 फीसदी से अधिक का कर्ज है। मुफ्त चुनावी घोषणाओं का सिलसिला प्रकाश सिंह बादल के समय शुरू हुआ था और अब भी जारी है।
    सबसे पहले 1997 में प्रकाश सिंह बादल ने शुरू किया मुफ्त चुनावी घोषणाओं का सिलसिला
    सर्वप्रथम 1997 के चुनाव से पहले शिरोमणि अकाली दल के प्रधान प्रकाश सिंह बादल ने किसानों को निशुल्क पानी देने का ऐलान किया। जब उनसे पूछा गया कि किसान तो ज्यादातर ट्यूबवेल लगाकर अपना काम चलाते हैं तो उन्होंने कहा कि उनके बिजली का खर्च भी सरकार उठाएगी। उस समय इस घोषणा को लागू करने पर 350 करोड़ रुपये का खर्च आता था। किसानों ने इसकी कभी मांग नहीं की थी। यह खर्च साल दर साल बढ़ते हुए आज 25 साल बाद 7500 करोड़ हो चुका है।
    मुफ्त चुनावी घोषणाओं ने बिगाड़ी पंजाब सरकार के खजाने की हालत
    इससे पंजाब के खजाने की हालत बिगड़ गई है। 2007 में एक बार फिर से चुनावी रेवड़ियां बांटते हुए शिरोमणि अकाली दल -भाजपा गठबंधन ने गरीब लोगों को चार रुपये प्रति किलो की दर से आटा और बीस रुपये प्रति किलो की दर से दाल देने का ऐलान किया। गठबंधन सत्ता में आ गया लेकिन हर साल 1200 करोड़ रुपये का बोझ पंजाब के खजाने पर पड़ गया।
    कैप्टन अमरिंदर सिंह के समय भी मुफ्त घोषणाओं से भी खजाने पर पड़ा भारी दबाव
    2017 में कैप्टन अमरिंदर सिंह ने सभी किसानों का कर्ज माफ करने और उद्योगों को पांच रुपए प्रति यूनिट देने वादा कर दिया। इस वादे को पूरा करने के लिए सरकार ने 6000 करोड़ रुपये का कर्ज लिया और किसानों का कर्ज माफ कर दिया। जबकि, उद्योगों को पांच रुपये प्रति यूनिट बिजली देने के एवज में हर साल 1900 करोड़ रुपये का बोझ खजाने पर पड़ गया।
    विभिन्न सामाजिक पेंशन से भी खजाने को हो रहा नुकसान
    ये तो वे चुनावी रेवड़ियां थीं जिसके लिए कभी किसी से वर्ग ने मांग नहीं की । इसके अलावा 27 लाख वृद्धों, आश्रित बच्चों, विधवाओं आदि को 1500 रुपये हर महीने पेंशन आदि देने पर भी हर साल 4000 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च हो रहा है।
    मुफ्त चुनावी घोषणाओं और उनको पूरा करने का असर यह हुआ है कि 1986 में जो पंजाब कैश सरप्लस था आज तीन लाख करोड़ से ज्यादा कर्ज के भार से दब गया है। वैसे, पंजाब के वित्तमंत्री हरपाल चीमा ने बताया कि चालू वित्तीय वर्ष के अंत तक सरकार पर 2.63 लाख करोड़ रुपये का कर्ज हो जाएगा। इस कर्ज में 31 हजार करोड़ का वह कर्ज शामिल नहीं है जो फूड अकाउंट का है और पूर्व अकाली-भाजपा सरकार ने केंद्र सरकार के दबाव में जाते जाते खरीद एजेंसियों से सरकार पर ले लिया। पंजाब सरकार को हर साल 3270 करोड़ रुपये की किश्त देनी पड़ रही है यह दीर्घ अवधि कर्ज है।
    पिछले पांच साल में कर्ज 44.23 फीसद बढ़ा
    वित्तमंत्री चीमा ने बताया कि पिछले पांच सालों में ही कर्ज 44 .23 फीसद बढ़ा है। अगर हम इस कर्ज की ब्याज अदायगी आदि का आमदनी से आकलन करें तो स्थिति और भी चिंताजनक बन जाती है। राज्य के अपने सभी स्रोतों से कुल आमदनी 45588 करोड़ रुपये है। इसमें से 20122 करोड़ रुपये कर्ज के ब्याज और 15845 करोड़ रुपये बिजली सब्सिडी में ही चली जाती है।
    वेतन व पेंशन पर 31 हजार करोड़ रुपये से अधिक का खर्च
    चीमा ने बताया कि इसके अलावा बड़ा खर्च सरकारी कर्मचारियों के वेतन और पेंशन का है। इस पर इस साल 31171 करोड़ रुपए होने हैं। इसलिए इन सभी खर्चों को पूरा करने के लिए या तो सरकार की निर्भरता केंद्रीय ग्रांट, केंद्रीय योजनाओं आदि पर निर्भर है या फिर लिए जाने वाले कर्ज पर। उन्होंने बताया कि पिछले कर्ज के मूल और ब्याज को चुकाने के लिए ही कर्ज लेना पड़ रहा है। पिछली सरकारों ने पंजाब को कर्ज-जाल में फंसा दिया है।
    आम आदमी पार्टी ने भी खूब बांटी है चुनावी रेवड़ियां
    ऐसा नहीं है कि आम आदमी पार्टी की सरकार पिछली सरकारों से कुछ हटकर काम कर रही है। चुनावी रेवड़ियां वह भी खूब बांट रही है। हर घर को 300 यूनिट निशुल्क बिजली देने से अब कुल निशुल्क बिजली की सब्सिडी 15845 करोड़ रुपए हो गई है।
    जीडीपी के 45.88 फीसदी के बराबर है कर्ज
    पंजाब पर इस समय 2.63 लाख करोड़ का कर्ज है जो कुल घरेलू सकल उत्पाद का 45.88 प्रतिशत है। इसके अलावा राज्य सरकार के बोर्ड और कापोर्रेशन ने भी 55 हजार करोड़ का कर्ज लिया हुआ है इसमें से 22250 करोड़ रुपये की गारंटी राज्य सरकार ने दी हुई है।
    चीमा बोले- पिछली सरकारों ने राज्य की आमदनी बढ़ाने के उपाय नहीं किए
    वित्तमंत्री हरपाल चीमा ने बताया कि पिछली सरकारों ने राज्य की अपनी आमदनी बढ़ाने और जीएसडीपी को बढ़ाने के लिए कोई काम नहीं किया। केवल केंद्र सरकार की ग्रांट और केंद्रीय करों में हिस्से या फिर जीएसटी की मुआवजा राशि पर ही निर्भर रहे। आज जीएसटी की मुआवजा राशि बंद हो गई है। ऐसे में इन खर्चों का भुगतान 2022 के बाद कैसे होगा, इस बारे में पूर्व कांग्रेस सरकार ने कुछ नहीं सोचा।